सऊदी अरब में स्थ‍ित अरामको के संयंत्रों पर ड्रोन हमले से पूरी दुनिया को झटका लगा है। इस हमले के बाद सोमवार को जब बाजार खुले तो कच्चे तेल के दाम में करीब 20 फीसदी का उछाल आ गया जो 1991 के बाद पहली बार हुआ है। अब सबको इस बात को लेकर चिंता है कि आखिर इसका वैश्विक तेल आपूर्ति पर क्या असर होगा, यह संकट लंबा खिंचा तो क्या होगा? यहां जानते हैं हर सवाल का जवाब
कितना है उत्पादन पर असर
शनिवार को हुए इस हमले से सऊदी अरब के कुल उत्पादन का करीब आधा और वैश्विक आपूर्ति के 5 फीसदी हिस्से के उत्पादन में बाधा आई है। यही नहीं, सऊदी अरब ने इमरजेंसी के लिए जो 20 लाख बैरल प्रति दिन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता रखी है, उसका भी वह इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। सऊदी अरब एकमात्र ऐसा देश है जिसने आपात काल के लिए इतनी ज्यादा अतिरिक्त क्षमता रखी है।

तेल के कुएं खोदना और बुनियादी ढांचा तैयार करना काफी महंगा होता है, जिसे सभी देश वहन नहीं कर सकते।इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुसार, इस हमले से पहले OPEC (पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन) की कुल वैश्विक आपूर्ति 3।21 मिलियन बैरल प्रति दिन (mbpd) थी। इसमें से अकेले सऊदी अरब की आपूर्ति 2।27 mbpd थी। इसका मतलब यह है कि ओपेके के बाकी देशों के पास सिर्फ 9।4 लाख bpd की आपूर्ति क्षमता है, जिसमें से ज्यादातर कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात के पास है।
पहले से हो रही उत्पादन में कटौती
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, ओपेक और रूस जैसे उसके सहयोगी देश पहले से उत्पादन में कटौती भी कर रहे हैं, ताकि कीमतों में और गिरावट को रोका जा सके। असल में इसके पहले बाजार में तेल की ओवरसप्लाई हो गई थी। इस कटौती के द्वारा आपूर्ति में 1।2 mbpd की कमी लाने का लक्ष्य था। ज्यादातर कटौती सऊदी अरब से ही की गई है, इसलिए उसे तत्काल पलटा नहीं जा सकता। रूस जैसे गैर ओपेक देश भी महज 1 से 1।5 लाख bpd अतिरिक्त उत्पादन कर सकते हैं।
कई देशों पर प्रतिबंध
ईरान के पास अतिरिक्त क्षमता है, लेकिन उस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे होने की वजह से उसका इस्तेमाल बाकी दुनिया नहीं कर सकती। इस प्रतिबंध के बाद अप्रैल से अब तक ईरान के निर्यात में 20 mbpd की गिरावट आ चुकी है। वेनेजुएला की तेल इंडस्ट्री पर भी अमेरिका का प्रतिबंध लगा हुआ है। लेकिन पिछले वर्षों में वेनेजुएला के उत्पादन में काफी गिरावट आई है। प्रतिबंध हटाने के बाद भी वहां की सरकारी कंपनी PDVSA उत्पादन बढ़ा पाने में सक्षम नहीं होगी।
अमेरिका पर नजर
पिछले वर्षों में अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक देश बन गया है। इसकी वजह यह है कि वहां के टेक्सास फील्ड में शेल तेल-गैस सेक्टर से आपूर्ति में काफी तेजी आई है। वह तो अब सऊदी अरब से भी आगे निकल चुका है। अमेरिका ने जून में सऊदी अरब से ज्यादा कच्चा तेल निर्यात किया है। कीमतें बढ़ने पर अमेरिका के शेल उत्पादक तेजी से उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन इसमें भी कई महीने लग जाएंगे। यदि उन्हें लगेगा कि सऊदी संकट लंबा खिंचेगा और तेल की कीमतों में अच्छी तेजी आएगी, तो ही वे उत्पादन बढ़ा सकते हैं। लेकिन उत्पादन बढ़ने के बावजूद अमेरिका से निर्यात बढ़ने में अवरोध यह है कि वहां के ऑयल पोर्ट अपनी पूरी क्षमता के साथ भरे हुए हैं।
रिजर्व इस्तेमाल से भी खास फायदा नहीं
सऊदी अरब, अमेरिका और चीन के पास करोड़ों बैरल के तेल स्ट्रेटेजिक स्टोरेज में हैं। किसी आपात स्थ‍िति में तेल आपूर्ति में बाधा होने पर इस महत्वपूर्ण भंडार का इस्तेमाल किया जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा भी है कि तेल की कीमतों पर अंकुश और मांग को पूरा करने के लिए वे स्ट्रेटेजिक स्टोरेज का इस्तेमाल कर सकते हैं।
आईएए ने सभी बड़े देशों को सलाह दी है कि वे 90 दिन के तेल आयात के बराबर तेल अपने स्टोरेज में रखें। लेकिन ऐसी आपद आपूर्ति के भरोसे बाजार नहीं रह सकता, क्योंकि ऐसे भंडार खत्म करने का जोखिम कोई भी देश नहीं ले सकता।
फिर कोई बाधा आई तो होगी ज्यादा मुश्किल
अभी अगर अतिरिक्त क्षमता का इस्तेमाल कर लिया गया तो आगे किसी तरह के व्यवधान आने पर तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। इससे उत्पादक निवेश करने और ज्यादा उत्पादन करने को प्रोत्साहित होंगे। ओपेक देश लीबिया में गृहयुद्ध चल रहा है इसलिए वह उत्पादन बढ़ाने की हालत में नहीं है। तो लीबिया में यदि कुछ बड़ा व्यवधान आया तो फिर दुनिया में तेल की तंगी हो जाएगी।

नाइजीरिया से तेल की आपूर्ति में भी कई तरह से बाधा आ रही है।तो कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सिचुएशन बहुत टाइट है। सऊदी संकट यदि लंबे समय तक चला तो तेल की कीमतों के आसमान छूने से रोका नहीं जा सकता और इससे भारत सहित दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं को तगड़ी चोट पहुंचेगी।