लखनऊ: डॉलर की मजबूती का असर बनारस के सिल्क उद्योग पर भी साफ नजर आने लगा है। महंगे होते डॉलर के कारण सिल्क उद्योग में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों पर खासा असर पड़ा है। एक ओर घरेलू बाजार में सिल्क की साडियों और कपड़ों की कीमतों में इजाफा हुआ है तो दूसरी ओर विदेश से मिलने वाले निर्यात के आर्डर भी घटे हैं। विदेशों से डॉलर की पुरानी दर पर ऑर्डर ले चुके व्यापारियों पर अब उसी दर पर डिलिवरी देने का दबाव है जिस पर उन्होंने ऑर्डर लिया था जबकि डॉलर काफी मजबूत हो चुका है। बनारस सिल्क उद्योग में इस्तेमाल होने वाला करीब सौ फीसदी कच्चा माल इन दिनों बाहर से आता है। सिल्क धागेे की कीमत में बीते एक साल में ही 25-30 फीसदी से ज्यादा की बढ़त दर्ज की गई है जबकि तैयार कपड़ों, साडियों की रंगाई-छपाई में काम आने वाले रंग वगैरह की कीमत भी खासी बढ़ी है। महंगे डॉलर की वजह से न केवल घरेलू बाजार में बनारसी सिल्क उत्पादों की कीमत बढ़ी है बल्कि त्योहारी सीजन में विदेशों से आने वाली मांग भी घटी है। क्रिसमस और नए साल के कारण विदेशों में बनारसी सिल्क की सबसे ज्यादा मांग अगस्त से नवंबर के बीच होती है। करीब आधे से ज्यादा निर्यात ऑर्डर इसी सीजन में मिलते हैं।
बनारसी सिल्क के प्रमुख कारोबारी और निर्यातक रजत मोहन पाठक बताते हैं कि बीते साल चीन से आने वाला मलबरी सिल्क धागा 4,000 से 4,200 रुपए प्रति किलोग्राम था जो अब 6,000 रुपए प्रति किलोग्राम से ऊपर मिल रहा है। बनारसी सिल्क की साडियों में देशी रेशम के धागे की जगह 90 फीसदी चाइना सिल्क धागे का ही इस्तेमाल होता है। बेहतर फिनिशिंग व उभरते रंग के लिए बनारसी सिल्क कारोबारी ज्यादातर चाइनीज सिल्क धागे पर ही भरोसा करते हैं। पाठक का कहना है कि सिल्क के कपड़ों की रंगाई और छपाई के लिए इस्तेमाल होने वाले रंग सीबा आदि जर्मनी-यूरोपीय कंपनियों से मंगाए जाते हैं। लिहाजा उनकी कीमत में भी इजाफा हो गया है। महंगे डॉलर का असर उन मशीनों व कलपुर्जों पर भी पड़ा है जिनका इस्तेमाल सिल्क कारोबारी करते हैं। रजत बताते हैं कि घरेलू बाजार में ही सिल्क की साडियों व कपड़ों की कीमत 25 फीसदी से ज्यादा बढ़ गई है। उनका कहना है कि पुराने निर्यात ऑर्डर तो तैयार हो रहे हैं पर नए मिलने में दिक्कत होने लगी है।